रविवार, 18 दिसंबर 2011 1 टिप्पणियाँ

आज़-काल/ Aaz-Kaal

आज़-काल काळजे कुछ न्यूं छिलैं सैं दोस्तो,
देख कै नै दिल म्हैं फूल से खिलैं सैं दोस्तो।
या बात और सै ‘नमन’ के मिलते कोन्यां दिल तै दिल,
गात तो इब हाथ की तरियां मिलैं सैं दोस्तो।।
................-प्रवेश गौरी ‘नमन’
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011 3 टिप्पणियाँ

माँ शारदे / Maa Sharde

-:-
जोड़े खड़्या सूँ हाथ शारदे चांदी करदे
छंद बणा दे दास तू कविता बांदी करदे

मन्नै मिट्ठी बाणी दे दे
लम्बी सी कोए क्हाणी दे दे

जिसकै उप्पर लिख-लिख कविता
महाकाव्य मैं छपवा द्यूँगा
टेड्ढी न्यूँ ना देक्खै षारदे
तेरा बी फोटू टिकवा द्यूँगा

मन्नै अपणा भगत जाण ले
बस इतणी सी बात मान ले

कवि सम्मेलन जिद करवाऊँ
मन्नै थोड़ा मिल ज्या पीसा
दो च्यार हार घल ज्याँ गल़ म्हैं
तो शक्कर म्हैं रळ ज्या घी सा

माँ घर म्हैं पीसा बरसा दे
धन का तू मी’-सा बरसा दे

करवाले चहे कोए समीक्षा
बेशक ले ले मेरी परीक्षा

चहे मेरे फट्टे चकवा दे
गळी बीच आधा गडवा दे

उप्पर तै ल्हासी खिण्डवा दे
बेशक कुत्त्याँ पै चटवा दे

पर नम्र निवेदन सै मेरा माँ
मेरे काच्चे से कटवा दे

माँ मन्नै मोबाइल द्युवा दे
इन होट्ठाँ पै स्माइल द्युवा दे

अंग्रेजी के बोल सिखा दे
उर्दू हाळे झोल सिखा दे

छंद घड़ूँ मैं गिटपिट-गिटपिट
शब्दाँ की मैं लाऊँ लिपिस्टिक

अपणी तबियत पै न्यूँ ऐठूँ
सभा बीच सज-धज कै बैठँू

फेर माँ! अपणै देस की फिकर कोन्या करूँ
भ्रष्टाचार का जिकर कोन्या करूँ

धोळे लत्याँ का डर सै
ना दोष धरूँ गुण्डागर्दी पै
मन्नै छिŸार खाणे सैं जो
कुछ बी लिखूँ खाक्खी वर्दी पै

एक जै कह द्यूँ हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई
कोण सुणैगा
इन सार्याँ नै आप्पस म्हैं जे कह द्यूँ भाई
कोण सुणैगा

लठ लाग्गैंगे, जूत पड़ैंगे
ब्होत ए घणी कसूत पड़ैंगे

खून की बह ज्यागी नदी-सी
मेरी छड़ देंगे गधी-सी

भारत पाक दुश्मनी चहे और घणी बढ ज्या
भारत माँ का हर बेट्टा उस बली वेदी पै चढ ज्या

मैं क्यूँ लिखूँ जिद दिल्ली ए ना शरमावै
उनकी सेक्की आप खावै

अर, ना लिखूँ मैं आज की नारी कै उप्पर
खुद नै सबला कहण आळी बिच्यारी कै उप्पर

यें सबला सैं तो यें भ्रुण हत्या क्युक्कर हो ज्यावैं सैं
क्यूँ बेट्टी की मासूम छवि बिन जाग्गे सो ज्यावैं सैं

नारी शोषण ना बंद होया
दहेज हत्या बेअंत बणी
मन्नै तो न्यूँ लाग्गै सै
 यें युद्ध तै डरती संत बणी

कहण नै तो इननै सारे माँ कहवैं सैं
इनकै आँचल नै सिर की छाँ कहवैं सैं

फेर, क्यूँ इसपै दाग सै
नारी देवी सै,तो क्यूँ इसकै मूँह म्हैं झाग सै

फेर ना! इसपै तो मैं लिखूँ ए कोन्या
नारी चिंतक दिखूँ ए कोन्या

मैं क्यूँ मरवाऊँ झक
जिद कोए ना मांगै अपणा हक

चलो इन सबतै ध्यान तोड़ बी ल्यूँ
समाज कानी मूँह मोड़ बी ल्यूँ

किते भाषा का रण, किते जात की लड़ाई
किते काळै गौरै गात की लड़ाई

किते बढता भ्रष्टाचार, किते रिश्वतखोरी
लूट-पाट अराजकता, किते जारी चैरी

भारत माता बुढिया की तरियाँ
अपणे दिन काट्टै सै
क्युक्कर लिख द्यूँ मैं कविता
या कलम चलण तै नाट्टै सै

लिखणा मेरा सफल बणा दे
जनता कै मन अकल बणा दे
सारे एक हों, नारी मान हो
भारत पुष्पित कमल बणा दे।
भारत पुष्पित कमल बणा दे।।
रविवार, 20 नवंबर 2011 1 टिप्पणियाँ

चलचित्र और साहित्य में अंतर्सम्बन्ध / Chalchitra Aur Sahitya Me Antarsambandh


http://pgnaman.blogspot.com/
..
साहित्य में निहित ‘स$हित‘ का भाव उसे मानव कल्याण-रूपी प्रमुख धारा से जोड़ता है; अर्थात् जो रचना समाज के हित में लिखित है, वह साहित्य है। आरम्भ में प्रत्येक लिखित रचना के लिए ‘वाङ्गमय‘ शब्द प्रयुक्त होता था। कालांतर में ‘वाङ्गमय‘ शब्द का अर्थ-संकुचन हुआ और केवल विचार-प्रधान शास्त्रीय ग्रंथ ही वाङ्गमय की परिधि में आने लगे। लगभग बारहवीं शताब्दी में कला-प्रधान रचनाओं के लिए साहित्य शब्द प्रयोग किया जाने लगा। साहित्य के दो प्रमुख भेद किए गए गद्य एवं पद्य तथा इनके मध्य चम्पु की कल्पना की गई। इन भेदों के भी भेदोपभेद निर्धारित हुए; यथा गद्य में नाटक, कथा-कहानी, निबन्ध, उपन्यास, जीवनी, संस्मरण, आत्मकथा, रेखाचित्र, रिपोर्ताज आदि एवं पद्य के अंतर्गत महाकाव्य, खण्डकाव्य, मुक्तक, गीतिकाव्य, गद्यकाव्य आदि। सभ्यता और तकनीकि के विकास के साथ-साथ साहित्य में भी नवीन विधाओं का आगमन होता रहा तथा साहित्यिक विधाओं के रचना-विधान में अनेकानेक परिवर्तन होते रहे। चलचित्र का आरम्भ और विकास भी इसी विकासोन्मुखी परिवर्तन का परिणाम है।
परन्तु विचारणीय विषय यह है कि चलचित्र को आज भी साहित्य से भिन्न एक स्वतंत्र विधा ही समझा जाता है। पाश्चात्य मनीषियों ने ‘सिनेमा और साहित्य‘ के अंतर्सम्बन्धों पर कुछ शोध-कार्य अवश्य किया है, परन्तु उनकी दृष्टि भी ‘सिनेमा और उपन्यास’ के तुलनात्मक अध्ययन तक ही सीमित रही है। हिन्दी साहित्य में चलचित्र-जगत का अध्ययन नगण्य है और जो थोड़ा-बहुत कार्य हुआ है, वह भी चलचित्रों में प्रयुक्त गीतों से आगे नहीं बढ़ पाया है, जबकि प्राचीन नट-मण्डली एवं लीला-मण्डली से विकसित हो नाटक ही रंगमच के मार्ग से गुजरते हुए चलचित्र के वर्तमान रूप तक पहुँचा है, जिस रूप में साहित्य की प्रत्येक विधा के समागम की अद्भुत क्षमता है।
भारत में चलचित्र का आरम्भ 07 जुलाई 1896 को ‘लयूमियर ब्रदर्स‘ द्वारा निर्मित छः मूक लघु-चलचित्रों के प्रदर्शन द्वारा किया गया। यह प्रदर्शन बम्बई (वर्तमान मुंबई) के ‘वेटसन होटल‘ में किया गया।1 1898 में ‘हीराला सेन‘ ने सिनेमाघरों के लिए चलचित्र दश्य बनाने आरम्भ किए, जो ‘क्लासिक थियेटर‘, कलकता में प्रदर्शित होते थे।2 भारत का पहला पूर्ण लम्बाई का चलचित्र (3700फिट) ‘राजा हरिश्चन्द्र‘ 1913ई0 में ‘दादा साहब फाल्के‘ द्वारा बनाया गया, जिसे व्यावसायिक रूप में मई 1913 में प्रदर्शित किया गया।3 1931 में ‘आलम आरा‘ के प्रदर्शन के साथ ही भारत में सवाक् फिल्मों की शुरूआत हुई,4 जो वर्तमान तक विकासोन्मुख है। प्रारम्भिक चलचित्रों में गीत-संगीत कथानक पर हावी रहता था। सन् 1931 में निर्मित ‘मदन थियेटर्ज‘ में ‘शीरी फरहाद‘ फिल्म में पूरी 42 गीत थे।5 परन्तु वर्तमान में निर्मित चलचित्रों में विचार-तत्व को अधिक महत्त्व दिया जाता है और किसी भी चलचित्र की सफलता-असफलता गीत-संगीत में निहित न होकर सम्पूर्ण कथानक के तारतम्य पर आश्रित रहती है।
चलचित्र और साहित्य में गहरा अंतर्सम्बन्ध है। चलचित्र-विधा के अध्ययन के बिना साहित्य के पूर्ण अध्ययन की बात उपहास-सी लगती है। वास्तव में देखा जाए तो नाटक एवं रंगमंच का विकसित और परिवर्धित रूप ही चलचित्र है तथा चलचित्र का कथानक उपन्यास से अत्यधिक प्रभावित रहा है; यथा-‘उमेश राठौर‘ के शब्दों में, ‘सिनेमा में आज जो फ्लैश बैक दिखाया जाता है यह उपन्यास की ही देन है।‘6
चलचित्र और साहित्य के अंतर्सम्बन्ध पर अनेक विचारकों ने अपने मत दिए हैं:-
उमेश राठौर लिखते हैं, ‘फिल्म और साहित्य‘ के परस्पर लगाव का प्रश्न सदैव से ही जीवन्त रहा है। इस सम्बन्ध को विकसित करने में गीत, कविता, नाटक और उपन्यास की चर्चा भी अक्सर होती रही है, लेकिन फिल्में केवल उपन्यासों पर ही नहीं बनी-कथाओं पर भी निर्मित की गई।7
सम्पादक ‘मार्यर शामसी‘ ने चलचित्रों को ‘यांत्रिकी, कला और तकनीकी‘ का मेल मानते हुए लिखा है,“Cinema is a highly mechanical medium. It uses many mechanical devices like cameras, microphones, dubbing machines, editing machines etc. Film is a product of intraction between machines, artistic and technical people”. 8
वे आगे लिखे हैं, “In the beginning, it was considered as a medium of cheep entertainment, but now it was come to be considered as art form. Interactual and serious thinkers have associated themselves with cinema”. 9
‘जयदेव तनेजा‘ के शब्दों में, ‘‘कला प्रयास है, प्रयोग है, सृष्टि है, जीवन है-वस्तु नहीं है। रंग कला भी इसी अर्थ में एक उत्सव है, एक अनुष्ठान है- जीवनमय है, जीवनदायी है।‘‘10
वे पुनः लिखते हैं, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि अनेक कथा-कृतियाँ रंगमंच और सिनेमा के माध्यमों से सफलतापूर्वक रूपांतरित हुई हैं।‘‘11
रंगमंच और सिनेमा के प्रबुद्ध अभिनेता बलराज साहनी का कथन है, ‘‘फिल्म-कला को ‘आॅपरेशन टेबल‘ पर रखिए और उसकी चीरफाड़ कीजिए तो पता चलेगा कि फिल्म-कला दरअसल एक कला का नाम नहीं, बल्कि अनगिनत कलाओं के समूह का नाम है।‘‘12
सम्पादक डाoनाल्ड एच0 जान्सटान के अनुसार, “Cinematic adaptation of books, players, poems, diaries and comics demonstrate films profuse influence on print media”. 13
पुनश्च, “In addition to book adaptations, film is, able to extend the run of a play indefinitely through its climatic adaptation of it.” 14
पुनश्च, “Hence, film has a profound influence on print media, giving them a visual dimension that extends the original text’s popularity and scope”. 15
‘सुधीर ‘सुमन‘‘ के शब्दों में, ‘‘सिनेमा मनुष्य के कला के साथ अंतर्सम्बन्ध का दृश्यरूप है। मनुष्य के जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव के विवेक का नाम सिनेमा है।‘‘16
इस प्रकार अनेक विद्वानों ने चलचित्र एवं साहित्य के मध्य गहन अंतर्सम्बन्ध स्वीकार किए हैं। एक सत्य यह भी है कि चलचित्र में विविध कलाओं का समाहार सरलता से सम्भव है। यदि हम साहित्य के चलचित्र रूपांतरण का अध्ययन करे तो भी चलचित्र की उपादेयता स्वयं सिद्ध होती है।
‘जयदेव तनेजा’ ने चलचित्र को रंगमंच से अधिक विकसित एवं प्रभावी सिद्ध करते हुए लिखा है, ‘‘सिनेमा ने आरम्भ से ही विज्ञान के अविष्कारों का लाभ उठाया और तकनीकी दृष्टि से अद्भुत प्रगति की, जबकि रंगमंच विद्युत-प्रकाश के अतिरिक्त किसी भी वैज्ञानिक यंत्र को (यहाँ तक की माइक को भी) आत्मसात नहीं कर सका।‘‘17
‘मनोहर श्याम जोशी‘ चलचित्र की अपेक्षाकृत उच्च समागम क्षमता के आधार पर चलचित्र की उपादेयता को स्पष्ट करते हैं, ‘‘रंगमंच के लिए सीमित ही सैट लग सकते हैं इसलिए सीमित घटनाक्रम रखे जा सकते हैं। उतना ही दिखा जा सकता है जितना उन सैटों में हो सकता है। फिल्म और टी0वी0 में ऐसी कोई सीमा नहीं है।‘‘18
इस प्रकार विषय की व्यापकता और प्रभाव की अधिकता के आधार पर चलचित्र की साहित्य अध्ययन में उपादेयता स्पष्ट हो जाती है कि जिस पुरूषार्थ चातुष्ट्य, एवं लोकमंगल को साहित्य का प्रयोजन स्वीकार किया गया है, उनकी प्राप्ति चलचित्र के माध्यम से सुलभ एवं अधिक प्रभावी है।
चलचित्र की उपादेयता इससे भी इससे भी स्पष्ट होती है कि हिन्दी साहित्य के विभिन्न साहित्यकारों ने चलचित्रों के लिए पटकथाएँ लिखी हैं अथवा कई लेखकों के उपन्यासों, नाटकों,कहानियों आदि का चलचित्र रूपांतरण हुआ है।
‘सुदेश श्री‘ के अनुसार, ‘‘बहुत बरस पहले सुना था कि मुन्शी प्रेमचन्द्र भी माया नगरी पहुँचे थे। कुछ फिल्मों के लिए पटकथाएँ भी लिखी। नागर जी और उनकी सुपुत्री, भगवती बाबू, रेणुजी (शैलेन्द्र की वजह से), नीरज, आजकल उदय प्रकाश, बीच में मन्नू जी, राजेन्द्र जी, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, बच्चन जी आदि-आदि अनेक नाम कभी न कभी बाॅलीवुड से जुडे़ थे।‘‘19
‘‘अरूण अस्थाना‘ के अनुसार, ‘‘हाल ही में रिलीज हुई ‘परिणिता‘ बांग्ला के मशहूर उपन्यासकार शरत्चन्द्र के उपन्यास पर आधारित है।‘‘20
पुनश्च, ‘‘हिन्दी के साहित्यकार विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा‘ पर बनी ‘पहेली‘ के निर्माता शाहरूख खान हैं‘‘।21
पुनश्च, ‘‘बनारस 1918‘‘ मुंषी प्रेमचंद के उपन्यास ‘बाजारे-हुस्न‘ (उर्दू) या ‘सेवासदन‘ पर आधारित है।‘‘22
पुनश्च, ‘‘विषाल भारद्वाज आजकल रस्किन बाँड के उपन्यास ‘ब्लू अम्ब्रेला‘ पर फिल्म बना रहे हैं।‘‘23
पुनश्च, ‘‘वैसे ही ‘देवदास‘, ‘साहब, बीबी और गुलाम,‘‘ ‘उपराव जान‘ पर पहले भी हाथ आजमाया जा चुका है।‘‘24
इसी प्रकार सूरज का सातवाँ घोड़ा, सारा आकाश, आधे अधूरे, अलि बाबा चालीस चैर, हीर-राँझा, लैला-मजनू, सोहनी महिवाल, वारिस शाह, जोधा अकबर, शेख-चिल्ली के अतिरिक्त विभिन्न धार्मिक एवं साहित्यिक कृतियों के आधार पर भी चलचित्र निर्माण हुआ है, जो चलचित्र के अध्ययन की उपादेयता को स्पष्ट करता है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि साहित्य क्षेत्र में चलचित्र-विधा का अत्यंत महत्त्व है। साहित्य का विकसित रूप ही आज चलचित्र के नाम से जाना जाता है। साहित्य की प्रत्येक विधा को आत्मसात करने में सक्षम और सामाजिक पर सीधे और शीघ्र प्रभाव उत्पन्न करने के गुणों के परिणामस्वरूप ही चलचित्र की साहित्य अध्ययन में उपादेयता स्वतः स्पष्ट होती है। अतः साहित्य के शोधकार्य में चलचित्रों पर आधारित शोध को भी सम्मिलित करना अधिक समिचीन एवं सार्थक है तथा यह साहित्यिक शोध के लिए नवीन मार्ग प्रशस्त करेगा।
पाद टिप्पणी-
1: http://hi.wikipedia.org/wiki/%/Eo/A4%AD%
2. http://hi.wikipedia.org/wiki/%/Eo/A4%AD%
3. वही।
4. डाॅ0 चन्द्र भूषण गुप्त ‘अंकुर‘; आजादी की लड़ाई और हिन्दी सिनेमा; पृ0 63
संस्कृति (अंक-7); वर्ष 2009 उतरार्द्ध।
5. औंकार प्रसाद शास्त्री; हिन्दी चित्रपट का गीति साहित्य; पृ0 52
6. उमेष राठौर; पटकथा लेखनः फीचर फिल्म; पृ0 14
7. वही; पृ0 14
8. Maryar Shami (Ed.); Encyclopedia of mass communication in twenty first century; page 25
9. वही; पृ0-25
10. जयदेव तनेजा; रंगकर्म और मीडिया; पष्015
11. वही; पृ0 28
12. वही;पृ0 35
13 Ed. D.H. Johnston; Encyclopedia of International media and communication; page-8
14. वही; पृ0 08
15. वही; पृ0 8
16. सुधीर सुमन; http://old.hastakshep.com/view info.php?id=866
17. जयदेव तनेजा; रंगकर्म और मीडिया; पृ019
18. मनोहरश्याम जोशी; पटकथा लेखन; http://pustak.org/bs/home.php?bookid=3167
19. सुदेश श्री; http://sudeshsri_blogspot.com/2010/01/blog-spot.html
20. अरूण अस्थाना; साहित्य और इतिहास की ओर हाॅलीवुड; www.bbc.co.uk
21.वही
22. वही
23. वही
24. वही.
सोमवार, 14 नवंबर 2011 0 टिप्पणियाँ

वो छोरा / Woh Chhora

एक हाथ म्हें तख्ती लेऱ्या वो छोरा!
कलम, दवात अर बरती लेऱ्या वो छोरा!!

पाट्या झोल़ा टांग रह्या वो खोवै पै,
फटी-पुराणी काप्पी लेऱ्या वो छोरा!

पोह का महिन्ना, पाट्टे बूट, दिखें एड्डी,
पाट्टी जर्सी, सिसकी लेऱ्या वो छोरा!

दूर सड़क पै चा' की रेहड़ी दिक्खै सै,
मन-मन के म्हें चुस्की लेऱ्या वो छोरा!

कद पढ़नै का चा था, दलिये का मोह था,
बस्ते भित्तर थाळी लेऱ्या वो छोरा!!

(बाल-दिवस पर विशेष)
शुक्रवार, 11 नवंबर 2011 3 टिप्पणियाँ

जिंदगी नै के कहूँ / Zindagi Nai Ke Kahun

जिंदगी नै के कहूँ एक रेल सै!
आना-जाना भीड़ धक्कम-पेल सै!!
कोए भीड़ म्हें टुल्ले, को सोवै चैन तै,
को-को पसेंजर कोए-कोए मेल सै!
को एक्सप्रेस रूकती न को रुक-रुक चलै,
को लिकड़गी आग्गे को गेल्लम-गेल सै!
ईश्क होणा टकराणा दो गाड़ियाँ का,
ब्याह स्टेशन मास्टर की जेल सै!
राजनीती का टेसण जित भी आज्या सै,
झूठ मक्कारी की लाग्गी सेल सै!
दो घड़ी सां बीमार चैन-सी खिंचगी,
न तो खानै म्हें ब्रेक फ़ैल सै!
मौत कै टेसण पै उतर ले 'नमन'
जिंदगी का बस यो हे तो खेल सै!!
.
(हरियाणवी कविता-संग्रह "प्रथम-प्रेम-पाती" से)
सोमवार, 7 नवंबर 2011 2 टिप्पणियाँ

होळ बणा ले / Hol Bana Le

पहलम जेट्टा गोळ बणा ले
आग बाळ कै होळ बणा ले

बूई काट बुहारी कर ले,
तार अंगोछा झोळ बणा ले!

तेज बाळ बळ ज्यांगे बुट्टे,
आड़े आज्या ओळ बणा ले!

एक बनछटी मोट्टी ठाल्या,
चिमटा उसनै तोड़ बणा ले!!

(हरियाणवी कविता संग्रह "मोर के चंदे" से....)
शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

यमराज आग्या / Yamraj Agya

*-*
मेरी घर आळी गाम जा री थी
मन्ने चैन की साँस आ री थी

दो रोट्टी पोई अर खा कै सो ग्या
नई-नई पड़ोसन कै सुपने म्हें खो ग्या

फेर सुपन्या का के भरोसा, यो तो जंजाळ हो सै
दो घड़ी की ख़ुशी, च्यार घड़ी का काळ हो सै

सुपने म्हें ए आँख खुली, मैं घणा थर्राग्या
जिद मन्ने देक्ख्या - स्याम्हीं यमराज आग्या

सिर पै सिंगां आल़ा मुकुट, गेल्यां काल़ा झोटा था
मेरे कत्ति समझ म्हें आगी, मेरे सासाँ का टोट्टा था

मैं समझ ग्या अक मेरी ज्यान का खो आग्या
अर मेरे म्हें फेर जीण का मोह आग्या

मन्ने सोच्ची- रै मिट्ठू मिट्ठा बण के बोल ना तो मर ज्यागा
इसकै एक झटके म्हें सुरग कान्ही पैर कर ज्यागा

मैं बोल्या, यमराज जी के करो सो
मेरे गात म्हें के भरो सो?

वो बोल्या- चुप पड्या रह
तेरी सांसां नै बाढ़ ल्यूं
फेर बतलावाँ गे
पहल्यां तेरी ज्यान काढ ल्यूं

घर आळी होत्ती तो उसनै आग्गे कर देत्ता
मेरी ज्यान तो या हे सै, हाँ भर देत्ता

क्यूँ हाँसो सो कई बै अपणापण दिखाणा ए पडे सै
गरज म्हें गधा भी बाप बनाणा ए पडे सै

फेर ईब के चारा था, वा  तो जा रही पीहर थी
मेरी कढी-सी रंधे थी, वा खा रही हलवे-खीर थी

ईब तो मन्ने ए मुकाबला करणा था
मुकाबला के; सिद्धी बात सै- मरणा था

मन्ने दिमाग की चाब्बी घुमाई
अर मेरे एक बात याद आई

अक हर आदमी एक ठीक टेम पै मरया करे सै
वो टेम लिकड्या पाच्छै घणा ए जीया करे सै

मेरे भित्तर का कवी बोल्या जबान कि कलम चला ले
वा घड़ी लिकड़ण तक इसनै बत्तां म्हें उळझाले

मैं बोल्या- छोडो नै यमराज जी
के सांसां म्हें ए ध्यान सै
पहलम न्यू तो सुना दो
थारा के ज्ञान सै

वो बोल्या ज्ञान-ग्यून तो के सै
दिनां कै धक्के ला ऱ्या सूँ
सांस ल्याण अर ले ज्याण आलै
डाकिये की ड्यूटी निभा ऱ्या सूँ

मेरे साथ के लाग्गे चपड़ासी
आज अफसर हो रे सै
ये मेरे फुट्टे करम
बेरा न कित सो रे सै

सदियाँ गुजरगी कदे या न सुणी
अक परमोसन होग्या
इसी नौकरी लाग्गी
मेरा तो शोषण होग्या

चलो छोडो यमराज जी,
सुरग कि राजनीती का के दौर सै
इंद्र ए जित्तैगा अक थारा जोर सै?

वो बोल्या- मैं के जित्तुं गा
मन्ने तो फारम ए न भरया
धोल़े लात्त्याँ का भाव देख कै
जी ए न करया

अर रही बात जित्तण की
तो वो ए जित्त्य पावैगा
जो सरे देव्त्यां कै घरां
दारू पहुंचावैगा

फेर चाल्लैगा बैंच तलै का लेणा अर देणा
दूसरे के दुखाँ म्हें झुट्ठी आँख भेणा

फेर बिछेगी वोट तोड़ण की
शतरंज कि बिसात
जिस म्हें प्यादे बनेंगे
धरम, भाषा, जात अर पात

फेर बदले जंगे ढोल
जिद बेर लाग्गैगा
किस कान्ही सै झोल

मैं बोल्या- छोडो यमराज जी न्यू क्युक्कर तिरो सो
वो चित्रगुप्त कित सै किम्मे ऐकले ए फिरो सो

वो बोल्या रै न पुच्छे या हे बात
वो तो मेरी यम्मी नै ल़े उड्या पाछली रात

इतनै म्हें उसकी आंख म्हें आंसू की धार आगी
अर मेरै उसकी दुखती रग थ्यागी

मैं बोल्या यमराज जी बीरबानियां का के ठिकाणा सै
आजकाल इस्सा ए जमाना सै

इब मेरली नै देख ल्यो वा के सुद्धी सै
शिकल की सिद्धी फेर अक्ल की मुद्धी सै

इब थारे तै के ल्ह्को सै वा रोज बेल्लण ठावे सै
दिन म्हें गधे की तरियां कमाऊं रात नै मुर्गा बनावै सै

न्यू सोच ल्यो अपन तो भाई-भाई सां
एक ए सुस्सरै के दो जमाई सां

इतनी देर म्हें वो मेरी बत्तां नै भांप ग्या
अर उसका मोट्टा हाथ मेरी घेट्टी नाप ग्या

मने अरदास करी-
मन्ने मर कै के पाओगे
मेरी दो हाड्डी सें
इनका के वज्रधनुष  बनाओगे

फेर मेरी आंखां आगै को
घूम ग्या दधीची
वो वृतासुर का आतंक
वा पाप की बगिच्ची

अर गेलयाँ घूम ग्या भारत म्हें फैल्या भ्रष्टाचार
महंगाई, बेरोजगारी, राजनीती की मार

आज गळी-गळी म्हें दानवता का नंगा नाच सै
खुद भाई के हात्था तै भाणा नै आंच सै

यो बेरोजगारी का दानव के छोट्टा सै
या राजनीती तो बे-पैंदी का लोट्टा सै

भ्रष्टाचार मिटाऊंगा न्यू कह के जो भी आवै सै
फेर इस्से दलदल म्हें धंस ज्यावे सै

इस नशाखोरी की भी गहरी जड़ गड री  सै
घरां बाळक तरसैं दूध नै महफ़िल म्हें दारु उड़ री सै

दहेज़ सै, भ्रूण-हत्या सै; जात-पात सै, धर्म सै
माँ-बाप की लिहाज नहीं के या ए शर्म सै?

आज भी अशिक्षा सै, शोषण सै, बाल-मजदूरी सै
घर-घर म्हें सें वृतासुर धधिची एक जरूरी सै

एक-एक बात मेरी आंखां म्हें तुल गी
फेर के करता इतनै म्हें मेरी आँख खुल गी

जिद बेर लाग्या अक या तो सुपने की बात थी
यमराज कित्ते न था, मैं था, काळी रात थी

मेरे क्यूँ न काढ़े प्राण इसे बात पै रोऊँ सूं
धक्के तै आँख मीच यमराज नै टोहूँ सूं

अक हे यमराज जी मेरा सुपा साच्ची कर दे
मेरी हाड्डी बेसक लेले, देश नै खुशियाँ तै भर दे

मैं तो ठंडी सांस भरूँ सूं
यमराज तै यो ए निवेदन करूँ सूं-

मेरी एक-एक हाड्डी ले ले
इनका वज्र-धनुष बणा दे
अर इस भ्रष्टाचार कै
वृत्तासुर नै मिटा दे!
अर इस भ्रष्टाचार कै
वृत्तासुर नै मिटा दे!
अर इस भ्रष्टाचार कै
वृत्तासुर नै मिटा दे!!

(हरियाणवी कविता-संग्रह "मोर के चंदे से")
बुधवार, 2 नवंबर 2011

जो तू कह / Jo Too Kah

जो तू कह वा बात कहूँगा
तू कह दिन नै रात कहूँगा

A B C नै क ख कह दयूं
दो अर दो नै सात कहूँगा

तेरै बाप नै कितणा पिट्या
क्युक्कर घुस्से-लात कहूँगा

बीर तेरा सीखै कर्राटे
चढ़गी मेरी स्यात कहूँगा

गऊ धंसी गारया म्हें मेरी
साम्मण की बरसात कहूँगा

आ तन्नै कोळी म्हें भर के
दिल के सब ज़ज्बात कहूँगा

(हरियाणवी कविता संग्रह "मोर के चंदे" से...)

म्हारै हरियाणा म्हें / Mharai Haryanai Mhain

होळी अर फाग गावैं, कूवै पै तै पाणी ल्यावैं,
इसी सोणी नार देखो म्हारै हरियाणा म्हें!
दामण-कुडती देखो, बोरला-चुंदड़ी देखो,
कंठी अर हार देखो म्हारै हरियाणा म्हें!
एक रहवैं भाई-भाई, मिलकै करैं कमाई,
प्रेम अर प्यार देखो, म्हारै हरियाणा म्हें!
तन के गठीले देखो, मन के रंगीले देखो,
आ कै एक बार देखो म्हारै हरियाणा म्हें!!
(हरियाणवी कविता-संग्रह "मोर के चंदे" से उद्धृत)
सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

दिवाळी क्यूँ सै/ Diwali Kyun Sai

इबकै इसी दिवाळी क्यूँ सै?
छात दीप तै खाल्ली क्यूँ सै??

न अम्बर आतीश गूंजता,
पट्टाख्यां की काल्ली क्यूँ सै?
...
एक भाई खात्तर भाई कै
दिल भित्तर कंगाल्ली क्यूँ सै?

काल़ा गात खून के छिट्टे,
रात इसी बदहाल्ली क्यूँ सै?

माँ नै बिन जाई आँख्यां म्हें
मौत की स्याही घाल्ली क्यूँ सै?

'नमन' रोज़ की घटना सै या
तेरे काळजै सल्ली क्यूँ सै??

('मोर के चंदे' हरियाणवी कविता-संग्रह से उद्धृत)

आई दिवाळी / Aayi Diwali

आई दिवाळी चसे दीवड़े, हे सखी रामराज आया री
आई दिवाळी चसे दीवड़े, हे सखी रामराज आया री

दिवाळी का चा था
सबकै मन उत्साह था
एक-दूसरे नै मिल के सारे बधाई दे रे थे
कोए ग्रीटिंग बांटें थे अर कोए मिठाई दे रे थे
घर लिपे-पुते चमक रे थे
नए सूट गात पै दमक रे थे
बजार जाण की त्यारी थी
पटाखे ल्याण की बारी थी
बजार सुरग से लाग्गैं थे, हर-एक हाट सज री थी
किते स्वर थे मंत्रोच्चारण के तो किते बांसळी बज री थी
चसे दीव्याँ कै चान्दन्याँ म्हें मावस म्हें उजासी छा री थी
मिला सुर तै सुर अर गळ तै गळ सखी गीत यो गा री थी-

आई दिवाळी चसे दीवड़े, हे सखी रामराज आया री
आई दिवाळी चसे दीवड़े हे सखी रामराज आया री

बजार कै मोड़ पै सड़क का कूणा
टुट्टी-सी खाट, पाट्या-सा बिछूणा
थोड़े-सी मोमबत्ती, थोड़ी-सी फूलझड़ी
थोड़ी-सी टिकिया, थोड़ी पटाख्याँ की लड़ी
लेल्यो पटाखे सस्ते ले ल्यो, एक बाळक बोल लगा ऱ्या था
आंदे-जांदे किस्से का पर उसपै ध्यान ना जा ऱ्या था
वो भी मन म्हें दिवाळी का उत्साह ले के आया था
मिठाई नहीं, माँ की दुवाई का चा ले के आया था

माँ घणी बीमार थी
चालण- फिरण तै लाचार थी
बाब्बू उसका खा लिया था दारू-खोरी नै
बड़ा भाई निगळ लिया था सेठ की तिजोरी नै
कासण-भारी करके नै माँ थोड़ा-घणा कमाया करती
आप भुक्खी रह के नै भी उसनै टूक खुवाया करती

पर कोढ़ म्हें खाज की तरियां या किस्मत की मार हो सै
इसकै आग्गे आदमी का हर सुपना लाचार हो सै
उस दिन खुद उसकै मन म्हें या सबतै बड़ी गरीबी लाग्गी
भूख-प्यास कै कारण तै उसकी माँ लकवै म्हें आगी
घर की सारी जिम्मेदारी उसकै कांधे आ ली थी
बारह साल कै छोटे सै उस सर पै कुण्डी ठा ली थी

किस्मत नै जो भी कर दी थी, उसका कती मलाल नहीं था
माँ का साया सर पै था, गरीबी का ख्याल नहीं था
गरीबी म्हें धंसी आख्याँ तै कोए गाहक टोह ऱ्या था
उधार लिए पटाख्याँ नै वो देख-देख के रो ऱ्या था
इतने म्हें ए लिकड़ गळी तै सोहद्यां की आगी टोळी
एक अळबाद्दी नै आग्गे बढ़ भर ळी पटाख्याँ की झोळी
उसकै पीसे मांगण पै ए इतणी बड़ी सज़ा देई
गेर पटाख्याँ कै उप्पर फेर उनम्हें सींख लगा देई

पटाख्याँ की धडाम-धडाम नै, तोड़ देई ख़ामोशी थी
उस गरीब के सुपन्या उप्पर ल्या देई बेहोशी थी
दो मिनट म्हें सारे पटाक्खे बाज-बूज कै थम गे
उस गरीब कै लहू के छींटे सड़क कै उप्पर जम गे
फेर, किसे नै ठाया कोन्या
अस्पताळ पहुंचाया कोन्या

जिद वो होश म्हें आवण लाग्या
तो, न्यू ए बुदबुदावण लाग्या-
बरसां तै बढ़ री सै माँ, या आस नहीं टूटण दयूंगा
तेरै इलाज तै पहल्यां माँ मेरी साँस नहीं टूटण दयूंगा
उट्ठण की हिम्मत कोन्या थी, हट के बेहोसी छा री थी
दूर गळी कै एक कोणे पै सखी गीत यो गा री थी

आई दिवाळी चसे दीवड़े, हे सखी रामराज आया री
आई दिवाळी चसे दीवड़े, हे सखी रामराज आया री

के यो हे रामराज सै?
जित डुब्या होया भविष्य अर खोया होया आज सै

जे यो हे रामराज सै तो लानत सै इस राज नै
भीम सुभाष टैगोर कै भटकै होयै समाज नै
समाजवाद की छात्ती म्हें बेट्ठ्या होया भाल्ला
राजनीती की मक्कारी, भ्रष्टाचार का बोलबाल्ला
इस तै ज्यादा मजबूरी के होगी इस जहान म्हें
माँ छाती का खून बेच दे दो शेर धान म्हें
जिस दिन यें बुराई म्हारै भारत तै मिट ज्यावें गी
भारत की जनता उस दिन साच्ची मन तै गावै गी-

आई दिवाळी चसे दीवड़े, हे सखी रामराज आया री!
आई दिवाळी चसे दीवड़े, हे सखी रामराज आया री!!
.
(हरियाणवी कविता संग्रह 'मोर के चंदे' से उद्धृत)
मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

दिवाळी क्यूँ सै/ Diwali Kyun Sai

इबकै इसी दिवाळी क्यूँ सै?
छात दीप तै खाल्ली क्यूँ सै??

न अम्बर आतीश गूंजता,
पट्टाख्यां की काल्ली क्यूँ सै?

एक भाई खात्तर भाई कै
दिल भित्तर कंगाल्ली क्यूँ सै?

काल़ा गात खून के छिट्टे,
रात इसी बदहाल्ली क्यूँ सै?

माँ नै बिन जाई आँख्यां म्हें
मौत की स्याही घाल्ली क्यूँ सै?

'नमन' रोज़ की घटना सै या
तेरे काळजै सल्ली क्यूँ सै??
शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

धिकताना देख्या / Dhiktana Dekhya


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(हरियाणवी कविता संग्रह 'मोर के चंदे' से उद्धृत)

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माँ शारदे / Maa Sharde

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(हरियाणवी कविता संग्रह 'मोर के चंदे' से उद्धृत)

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सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

भित्तर-भात्तर / Bhittar-Bhattar

हरियाणै कै भित्तर भात्तर होया हरि का आणा ऊणा।
दूध दाध ल्हास्सी ल्हुस्सी अर घी घा का सै खाणा खूणा।।

सुथरे साथरे, भोळे भाळे लोग लाग सैं सुद्धे साद्धे,
धोत्ती धात्ती, कुड़ता काड़ता, खिण्डका खुण्डका बाणा बूणा।

गौरी गारी, नार नूर दाम्मण दुम्मण पहरैं पाहरैं सैं,
चुंदड़ चांदड़ ओढ आढ कै पाणी पूणी ल्याणा ल्यूणा।

छोरी छारी, छोरे छारे काम कूम म्हैं तकड़े ताकड़े,
खेत खात अर ध्याड़ी ध्यूड़ी, बोझ बाझ का ठाणा ठूणा।

हरियाणै कै गाम गूम म्हैं नाम नूम ऐण्डी आण्डी सैं,
झग्गड़ झाग्गड़, पिल्लड़ पाल्लड़, काळा कूळा, काणा कूणा।

रोज राज की सैर सार सैं, मौज माज सैं घर घार भिŸार,
महमान्नां का आणा ऊणा, मेळै माळै जाणा जूणा।

घर घार की गौब्बर गाब्बर तै कांध कूंध लिप्पैं लाप्पैं सैं,
मंदर मांदर तै बी सोणा साणा गाँ का ठाणा ठूणा।

कंचे कांचे, बित्ती बात्ती, बिज्जो बाज्जो खेल खूल सैं,
बाळक बूळक खुश खाश र्हैं सैं, रोज राज का गाणा गूणा।

भाई भूई, ताऊ तूऊ, काका कूका  एक रह्वैं सैं,
बाब्बु बुब्बु,  दाद्दा दुद्दा  मिल कै करते वाणा वूणा।

दुष्मन दाष्मन कोए ना सै, आप्पस म्हैं सब एक आक सैं,
तण ताण राख्या रगां रागां म्हैं प्रेम प्रूम का ताणा तूणा।

घणा घुणा खुद खाद आ ऊ कै देख दाख ल्यो हरियाणै म्हैं,
इतणा उतणा बता दिया घणा घुणा ‘नमन’ ना स्याणा स्यूणा।।
शुक्रवार, 30 सितंबर 2011 2 टिप्पणियाँ

संस्कृति : एक विवेचन / Sanskriti : ek Vivechan

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1- MkWŒ ehjk xkSre ( lwj dkO; esa yksd&n`f’V dk fo”ys’k.k ( i`Œ 51
2- lEikŒ] prqosZnh }kjdk izlkn “kekZ ( laLd`r “kCnkFkZ dkSLrqHk ( i`Œ 1147
3- lEikŒ] izksñjkepUnz ikBd ( HkkxZo vkn”kZ fgUnh “kCndks”k (  i`Œ 745
4- lEikŒ] MkWŒ /khjsUnz oekZ ( fgUnh lkfgR; dks”k ¼Hkkx&1½ ( i`Œ \
5- MkWŒ js[kk “kekZ ( gfj;k.kk ds yksd xhrksa eas HkfDrHkkouk  i`Œ 13
6- n;k d`’.k ,oa fot; oxhZ; *fot;* ( lkfgR; laLd`fr vksj ;qx&cks/k ( i`Œ 102]
7- jke/kkjh flag fnudj ( laLd`fr ds pkj v/;k; ( i`Π653
8- MkWŒ fot; cgknqj flag ( e/;dkyhu lkaLd`frd psruk ds fud’k ij lwj dkO; ( i`Œ 54
9- jhrk /kudj ( gfj;k.kk dk yksd laxhr ( i`Π18
10- MkWŒ t;Hkxoku xks;y ( gfj;k.kk % iqjkrRo] bfrgkl] laLd`fr] lkfgR; ,oa yksd okrkZ ( i`Œ15 ¼izkDdFku½
11- MkWŒ oklqnso “kj.k vxzoky ( okX/kkjk ( i`Œ 10
12- i`Foh dqekj vxzoky ( Hkkjrh; laLd`fr :ijs[kk ( i`Π1&2
13- “kkafrfiz; f}osnh ( /kjkry ( i`Œ 4
14- MkWΠxqykc jk; ( Hkkjrh; laLd`fr ( i`Π4
15- MkWΠjkeewfrZ f=ikBh ( vkfndkyhu fgUnh lkfgR; dh lkaLd`fr ih<+h dk v/;;u ( i`Π6
16- MkWŒ eueksgu “kekZ  ( Hkkjrh; laLd`fr vkSj lkfgR; ( i`Œ 1
17- MkWΠnsojkt ( Hkkjrh; laLd`fr ( i`Π20
18- MkWΠnsojkt ( Hkkjrh; laLd`fr ( i`Π21
19- MkWŒ nsojkt ( laLd`fr nk”kZfud foospu ( i`Œ 30
20- MkWŒ xq.kiky flag lkaxoku ( gfj;k.koh yksd xhrksa dk lkaLÑfrd v/;;u ( i`Œ 33
21- MkWΠuxsUnz ( lkdsr ,d v/;;u ( i`Π100
22- xSjksyk okpLirh ( Hkkjrh; laLd`fr vkSj dyk ( i`Π60
23- vkpk;Z gtkjh izlkn f}osnh ( lH;rk vkSj laLd`fr xzaFkekyk  ( i`Œ 13
24- jkgqy lkad`R;k;u ( cks/k laLd`fr ( i`Π3
25- MkWŒ ehjk xkSre ( lwj dkO; esa yksd&n`f’V dk fo”ys’k.k ( i`Œ 50
26- MkWŒ jkedqekj Hkkj}kt ( vk/;kfRedrk vkSSj gfj;k.koh laLÑfrcks/k ( i`Œ 9&10
27- txnh”k pUnz ( fujkyk dkO; esa lkaLd`fr psruk ( i`Œ 12
28- ;”knso “kY; ( laLd`fr % ekuo drZO; dh O;k[kk ( i`Œ 1&2
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आशा है, हरियाणा प्रदेश और हरियाणवी बोली पर शोध कार्य कर रहे शोधार्थियों के लिए उपयोगी होगा!
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प्रवेश गौरी 'नमन' pg.naman@gmail.com