रविवार, 20 नवंबर 2011 1 टिप्पणियाँ

चलचित्र और साहित्य में अंतर्सम्बन्ध / Chalchitra Aur Sahitya Me Antarsambandh


http://pgnaman.blogspot.com/
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साहित्य में निहित ‘स$हित‘ का भाव उसे मानव कल्याण-रूपी प्रमुख धारा से जोड़ता है; अर्थात् जो रचना समाज के हित में लिखित है, वह साहित्य है। आरम्भ में प्रत्येक लिखित रचना के लिए ‘वाङ्गमय‘ शब्द प्रयुक्त होता था। कालांतर में ‘वाङ्गमय‘ शब्द का अर्थ-संकुचन हुआ और केवल विचार-प्रधान शास्त्रीय ग्रंथ ही वाङ्गमय की परिधि में आने लगे। लगभग बारहवीं शताब्दी में कला-प्रधान रचनाओं के लिए साहित्य शब्द प्रयोग किया जाने लगा। साहित्य के दो प्रमुख भेद किए गए गद्य एवं पद्य तथा इनके मध्य चम्पु की कल्पना की गई। इन भेदों के भी भेदोपभेद निर्धारित हुए; यथा गद्य में नाटक, कथा-कहानी, निबन्ध, उपन्यास, जीवनी, संस्मरण, आत्मकथा, रेखाचित्र, रिपोर्ताज आदि एवं पद्य के अंतर्गत महाकाव्य, खण्डकाव्य, मुक्तक, गीतिकाव्य, गद्यकाव्य आदि। सभ्यता और तकनीकि के विकास के साथ-साथ साहित्य में भी नवीन विधाओं का आगमन होता रहा तथा साहित्यिक विधाओं के रचना-विधान में अनेकानेक परिवर्तन होते रहे। चलचित्र का आरम्भ और विकास भी इसी विकासोन्मुखी परिवर्तन का परिणाम है।
परन्तु विचारणीय विषय यह है कि चलचित्र को आज भी साहित्य से भिन्न एक स्वतंत्र विधा ही समझा जाता है। पाश्चात्य मनीषियों ने ‘सिनेमा और साहित्य‘ के अंतर्सम्बन्धों पर कुछ शोध-कार्य अवश्य किया है, परन्तु उनकी दृष्टि भी ‘सिनेमा और उपन्यास’ के तुलनात्मक अध्ययन तक ही सीमित रही है। हिन्दी साहित्य में चलचित्र-जगत का अध्ययन नगण्य है और जो थोड़ा-बहुत कार्य हुआ है, वह भी चलचित्रों में प्रयुक्त गीतों से आगे नहीं बढ़ पाया है, जबकि प्राचीन नट-मण्डली एवं लीला-मण्डली से विकसित हो नाटक ही रंगमच के मार्ग से गुजरते हुए चलचित्र के वर्तमान रूप तक पहुँचा है, जिस रूप में साहित्य की प्रत्येक विधा के समागम की अद्भुत क्षमता है।
भारत में चलचित्र का आरम्भ 07 जुलाई 1896 को ‘लयूमियर ब्रदर्स‘ द्वारा निर्मित छः मूक लघु-चलचित्रों के प्रदर्शन द्वारा किया गया। यह प्रदर्शन बम्बई (वर्तमान मुंबई) के ‘वेटसन होटल‘ में किया गया।1 1898 में ‘हीराला सेन‘ ने सिनेमाघरों के लिए चलचित्र दश्य बनाने आरम्भ किए, जो ‘क्लासिक थियेटर‘, कलकता में प्रदर्शित होते थे।2 भारत का पहला पूर्ण लम्बाई का चलचित्र (3700फिट) ‘राजा हरिश्चन्द्र‘ 1913ई0 में ‘दादा साहब फाल्के‘ द्वारा बनाया गया, जिसे व्यावसायिक रूप में मई 1913 में प्रदर्शित किया गया।3 1931 में ‘आलम आरा‘ के प्रदर्शन के साथ ही भारत में सवाक् फिल्मों की शुरूआत हुई,4 जो वर्तमान तक विकासोन्मुख है। प्रारम्भिक चलचित्रों में गीत-संगीत कथानक पर हावी रहता था। सन् 1931 में निर्मित ‘मदन थियेटर्ज‘ में ‘शीरी फरहाद‘ फिल्म में पूरी 42 गीत थे।5 परन्तु वर्तमान में निर्मित चलचित्रों में विचार-तत्व को अधिक महत्त्व दिया जाता है और किसी भी चलचित्र की सफलता-असफलता गीत-संगीत में निहित न होकर सम्पूर्ण कथानक के तारतम्य पर आश्रित रहती है।
चलचित्र और साहित्य में गहरा अंतर्सम्बन्ध है। चलचित्र-विधा के अध्ययन के बिना साहित्य के पूर्ण अध्ययन की बात उपहास-सी लगती है। वास्तव में देखा जाए तो नाटक एवं रंगमंच का विकसित और परिवर्धित रूप ही चलचित्र है तथा चलचित्र का कथानक उपन्यास से अत्यधिक प्रभावित रहा है; यथा-‘उमेश राठौर‘ के शब्दों में, ‘सिनेमा में आज जो फ्लैश बैक दिखाया जाता है यह उपन्यास की ही देन है।‘6
चलचित्र और साहित्य के अंतर्सम्बन्ध पर अनेक विचारकों ने अपने मत दिए हैं:-
उमेश राठौर लिखते हैं, ‘फिल्म और साहित्य‘ के परस्पर लगाव का प्रश्न सदैव से ही जीवन्त रहा है। इस सम्बन्ध को विकसित करने में गीत, कविता, नाटक और उपन्यास की चर्चा भी अक्सर होती रही है, लेकिन फिल्में केवल उपन्यासों पर ही नहीं बनी-कथाओं पर भी निर्मित की गई।7
सम्पादक ‘मार्यर शामसी‘ ने चलचित्रों को ‘यांत्रिकी, कला और तकनीकी‘ का मेल मानते हुए लिखा है,“Cinema is a highly mechanical medium. It uses many mechanical devices like cameras, microphones, dubbing machines, editing machines etc. Film is a product of intraction between machines, artistic and technical people”. 8
वे आगे लिखे हैं, “In the beginning, it was considered as a medium of cheep entertainment, but now it was come to be considered as art form. Interactual and serious thinkers have associated themselves with cinema”. 9
‘जयदेव तनेजा‘ के शब्दों में, ‘‘कला प्रयास है, प्रयोग है, सृष्टि है, जीवन है-वस्तु नहीं है। रंग कला भी इसी अर्थ में एक उत्सव है, एक अनुष्ठान है- जीवनमय है, जीवनदायी है।‘‘10
वे पुनः लिखते हैं, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि अनेक कथा-कृतियाँ रंगमंच और सिनेमा के माध्यमों से सफलतापूर्वक रूपांतरित हुई हैं।‘‘11
रंगमंच और सिनेमा के प्रबुद्ध अभिनेता बलराज साहनी का कथन है, ‘‘फिल्म-कला को ‘आॅपरेशन टेबल‘ पर रखिए और उसकी चीरफाड़ कीजिए तो पता चलेगा कि फिल्म-कला दरअसल एक कला का नाम नहीं, बल्कि अनगिनत कलाओं के समूह का नाम है।‘‘12
सम्पादक डाoनाल्ड एच0 जान्सटान के अनुसार, “Cinematic adaptation of books, players, poems, diaries and comics demonstrate films profuse influence on print media”. 13
पुनश्च, “In addition to book adaptations, film is, able to extend the run of a play indefinitely through its climatic adaptation of it.” 14
पुनश्च, “Hence, film has a profound influence on print media, giving them a visual dimension that extends the original text’s popularity and scope”. 15
‘सुधीर ‘सुमन‘‘ के शब्दों में, ‘‘सिनेमा मनुष्य के कला के साथ अंतर्सम्बन्ध का दृश्यरूप है। मनुष्य के जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव के विवेक का नाम सिनेमा है।‘‘16
इस प्रकार अनेक विद्वानों ने चलचित्र एवं साहित्य के मध्य गहन अंतर्सम्बन्ध स्वीकार किए हैं। एक सत्य यह भी है कि चलचित्र में विविध कलाओं का समाहार सरलता से सम्भव है। यदि हम साहित्य के चलचित्र रूपांतरण का अध्ययन करे तो भी चलचित्र की उपादेयता स्वयं सिद्ध होती है।
‘जयदेव तनेजा’ ने चलचित्र को रंगमंच से अधिक विकसित एवं प्रभावी सिद्ध करते हुए लिखा है, ‘‘सिनेमा ने आरम्भ से ही विज्ञान के अविष्कारों का लाभ उठाया और तकनीकी दृष्टि से अद्भुत प्रगति की, जबकि रंगमंच विद्युत-प्रकाश के अतिरिक्त किसी भी वैज्ञानिक यंत्र को (यहाँ तक की माइक को भी) आत्मसात नहीं कर सका।‘‘17
‘मनोहर श्याम जोशी‘ चलचित्र की अपेक्षाकृत उच्च समागम क्षमता के आधार पर चलचित्र की उपादेयता को स्पष्ट करते हैं, ‘‘रंगमंच के लिए सीमित ही सैट लग सकते हैं इसलिए सीमित घटनाक्रम रखे जा सकते हैं। उतना ही दिखा जा सकता है जितना उन सैटों में हो सकता है। फिल्म और टी0वी0 में ऐसी कोई सीमा नहीं है।‘‘18
इस प्रकार विषय की व्यापकता और प्रभाव की अधिकता के आधार पर चलचित्र की साहित्य अध्ययन में उपादेयता स्पष्ट हो जाती है कि जिस पुरूषार्थ चातुष्ट्य, एवं लोकमंगल को साहित्य का प्रयोजन स्वीकार किया गया है, उनकी प्राप्ति चलचित्र के माध्यम से सुलभ एवं अधिक प्रभावी है।
चलचित्र की उपादेयता इससे भी इससे भी स्पष्ट होती है कि हिन्दी साहित्य के विभिन्न साहित्यकारों ने चलचित्रों के लिए पटकथाएँ लिखी हैं अथवा कई लेखकों के उपन्यासों, नाटकों,कहानियों आदि का चलचित्र रूपांतरण हुआ है।
‘सुदेश श्री‘ के अनुसार, ‘‘बहुत बरस पहले सुना था कि मुन्शी प्रेमचन्द्र भी माया नगरी पहुँचे थे। कुछ फिल्मों के लिए पटकथाएँ भी लिखी। नागर जी और उनकी सुपुत्री, भगवती बाबू, रेणुजी (शैलेन्द्र की वजह से), नीरज, आजकल उदय प्रकाश, बीच में मन्नू जी, राजेन्द्र जी, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, बच्चन जी आदि-आदि अनेक नाम कभी न कभी बाॅलीवुड से जुडे़ थे।‘‘19
‘‘अरूण अस्थाना‘ के अनुसार, ‘‘हाल ही में रिलीज हुई ‘परिणिता‘ बांग्ला के मशहूर उपन्यासकार शरत्चन्द्र के उपन्यास पर आधारित है।‘‘20
पुनश्च, ‘‘हिन्दी के साहित्यकार विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा‘ पर बनी ‘पहेली‘ के निर्माता शाहरूख खान हैं‘‘।21
पुनश्च, ‘‘बनारस 1918‘‘ मुंषी प्रेमचंद के उपन्यास ‘बाजारे-हुस्न‘ (उर्दू) या ‘सेवासदन‘ पर आधारित है।‘‘22
पुनश्च, ‘‘विषाल भारद्वाज आजकल रस्किन बाँड के उपन्यास ‘ब्लू अम्ब्रेला‘ पर फिल्म बना रहे हैं।‘‘23
पुनश्च, ‘‘वैसे ही ‘देवदास‘, ‘साहब, बीबी और गुलाम,‘‘ ‘उपराव जान‘ पर पहले भी हाथ आजमाया जा चुका है।‘‘24
इसी प्रकार सूरज का सातवाँ घोड़ा, सारा आकाश, आधे अधूरे, अलि बाबा चालीस चैर, हीर-राँझा, लैला-मजनू, सोहनी महिवाल, वारिस शाह, जोधा अकबर, शेख-चिल्ली के अतिरिक्त विभिन्न धार्मिक एवं साहित्यिक कृतियों के आधार पर भी चलचित्र निर्माण हुआ है, जो चलचित्र के अध्ययन की उपादेयता को स्पष्ट करता है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि साहित्य क्षेत्र में चलचित्र-विधा का अत्यंत महत्त्व है। साहित्य का विकसित रूप ही आज चलचित्र के नाम से जाना जाता है। साहित्य की प्रत्येक विधा को आत्मसात करने में सक्षम और सामाजिक पर सीधे और शीघ्र प्रभाव उत्पन्न करने के गुणों के परिणामस्वरूप ही चलचित्र की साहित्य अध्ययन में उपादेयता स्वतः स्पष्ट होती है। अतः साहित्य के शोधकार्य में चलचित्रों पर आधारित शोध को भी सम्मिलित करना अधिक समिचीन एवं सार्थक है तथा यह साहित्यिक शोध के लिए नवीन मार्ग प्रशस्त करेगा।
पाद टिप्पणी-
1: http://hi.wikipedia.org/wiki/%/Eo/A4%AD%
2. http://hi.wikipedia.org/wiki/%/Eo/A4%AD%
3. वही।
4. डाॅ0 चन्द्र भूषण गुप्त ‘अंकुर‘; आजादी की लड़ाई और हिन्दी सिनेमा; पृ0 63
संस्कृति (अंक-7); वर्ष 2009 उतरार्द्ध।
5. औंकार प्रसाद शास्त्री; हिन्दी चित्रपट का गीति साहित्य; पृ0 52
6. उमेष राठौर; पटकथा लेखनः फीचर फिल्म; पृ0 14
7. वही; पृ0 14
8. Maryar Shami (Ed.); Encyclopedia of mass communication in twenty first century; page 25
9. वही; पृ0-25
10. जयदेव तनेजा; रंगकर्म और मीडिया; पष्015
11. वही; पृ0 28
12. वही;पृ0 35
13 Ed. D.H. Johnston; Encyclopedia of International media and communication; page-8
14. वही; पृ0 08
15. वही; पृ0 8
16. सुधीर सुमन; http://old.hastakshep.com/view info.php?id=866
17. जयदेव तनेजा; रंगकर्म और मीडिया; पृ019
18. मनोहरश्याम जोशी; पटकथा लेखन; http://pustak.org/bs/home.php?bookid=3167
19. सुदेश श्री; http://sudeshsri_blogspot.com/2010/01/blog-spot.html
20. अरूण अस्थाना; साहित्य और इतिहास की ओर हाॅलीवुड; www.bbc.co.uk
21.वही
22. वही
23. वही
24. वही.
सोमवार, 14 नवंबर 2011 0 टिप्पणियाँ

वो छोरा / Woh Chhora

एक हाथ म्हें तख्ती लेऱ्या वो छोरा!
कलम, दवात अर बरती लेऱ्या वो छोरा!!

पाट्या झोल़ा टांग रह्या वो खोवै पै,
फटी-पुराणी काप्पी लेऱ्या वो छोरा!

पोह का महिन्ना, पाट्टे बूट, दिखें एड्डी,
पाट्टी जर्सी, सिसकी लेऱ्या वो छोरा!

दूर सड़क पै चा' की रेहड़ी दिक्खै सै,
मन-मन के म्हें चुस्की लेऱ्या वो छोरा!

कद पढ़नै का चा था, दलिये का मोह था,
बस्ते भित्तर थाळी लेऱ्या वो छोरा!!

(बाल-दिवस पर विशेष)
शुक्रवार, 11 नवंबर 2011 3 टिप्पणियाँ

जिंदगी नै के कहूँ / Zindagi Nai Ke Kahun

जिंदगी नै के कहूँ एक रेल सै!
आना-जाना भीड़ धक्कम-पेल सै!!
कोए भीड़ म्हें टुल्ले, को सोवै चैन तै,
को-को पसेंजर कोए-कोए मेल सै!
को एक्सप्रेस रूकती न को रुक-रुक चलै,
को लिकड़गी आग्गे को गेल्लम-गेल सै!
ईश्क होणा टकराणा दो गाड़ियाँ का,
ब्याह स्टेशन मास्टर की जेल सै!
राजनीती का टेसण जित भी आज्या सै,
झूठ मक्कारी की लाग्गी सेल सै!
दो घड़ी सां बीमार चैन-सी खिंचगी,
न तो खानै म्हें ब्रेक फ़ैल सै!
मौत कै टेसण पै उतर ले 'नमन'
जिंदगी का बस यो हे तो खेल सै!!
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(हरियाणवी कविता-संग्रह "प्रथम-प्रेम-पाती" से)
सोमवार, 7 नवंबर 2011 2 टिप्पणियाँ

होळ बणा ले / Hol Bana Le

पहलम जेट्टा गोळ बणा ले
आग बाळ कै होळ बणा ले

बूई काट बुहारी कर ले,
तार अंगोछा झोळ बणा ले!

तेज बाळ बळ ज्यांगे बुट्टे,
आड़े आज्या ओळ बणा ले!

एक बनछटी मोट्टी ठाल्या,
चिमटा उसनै तोड़ बणा ले!!

(हरियाणवी कविता संग्रह "मोर के चंदे" से....)
शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

यमराज आग्या / Yamraj Agya

*-*
मेरी घर आळी गाम जा री थी
मन्ने चैन की साँस आ री थी

दो रोट्टी पोई अर खा कै सो ग्या
नई-नई पड़ोसन कै सुपने म्हें खो ग्या

फेर सुपन्या का के भरोसा, यो तो जंजाळ हो सै
दो घड़ी की ख़ुशी, च्यार घड़ी का काळ हो सै

सुपने म्हें ए आँख खुली, मैं घणा थर्राग्या
जिद मन्ने देक्ख्या - स्याम्हीं यमराज आग्या

सिर पै सिंगां आल़ा मुकुट, गेल्यां काल़ा झोटा था
मेरे कत्ति समझ म्हें आगी, मेरे सासाँ का टोट्टा था

मैं समझ ग्या अक मेरी ज्यान का खो आग्या
अर मेरे म्हें फेर जीण का मोह आग्या

मन्ने सोच्ची- रै मिट्ठू मिट्ठा बण के बोल ना तो मर ज्यागा
इसकै एक झटके म्हें सुरग कान्ही पैर कर ज्यागा

मैं बोल्या, यमराज जी के करो सो
मेरे गात म्हें के भरो सो?

वो बोल्या- चुप पड्या रह
तेरी सांसां नै बाढ़ ल्यूं
फेर बतलावाँ गे
पहल्यां तेरी ज्यान काढ ल्यूं

घर आळी होत्ती तो उसनै आग्गे कर देत्ता
मेरी ज्यान तो या हे सै, हाँ भर देत्ता

क्यूँ हाँसो सो कई बै अपणापण दिखाणा ए पडे सै
गरज म्हें गधा भी बाप बनाणा ए पडे सै

फेर ईब के चारा था, वा  तो जा रही पीहर थी
मेरी कढी-सी रंधे थी, वा खा रही हलवे-खीर थी

ईब तो मन्ने ए मुकाबला करणा था
मुकाबला के; सिद्धी बात सै- मरणा था

मन्ने दिमाग की चाब्बी घुमाई
अर मेरे एक बात याद आई

अक हर आदमी एक ठीक टेम पै मरया करे सै
वो टेम लिकड्या पाच्छै घणा ए जीया करे सै

मेरे भित्तर का कवी बोल्या जबान कि कलम चला ले
वा घड़ी लिकड़ण तक इसनै बत्तां म्हें उळझाले

मैं बोल्या- छोडो नै यमराज जी
के सांसां म्हें ए ध्यान सै
पहलम न्यू तो सुना दो
थारा के ज्ञान सै

वो बोल्या ज्ञान-ग्यून तो के सै
दिनां कै धक्के ला ऱ्या सूँ
सांस ल्याण अर ले ज्याण आलै
डाकिये की ड्यूटी निभा ऱ्या सूँ

मेरे साथ के लाग्गे चपड़ासी
आज अफसर हो रे सै
ये मेरे फुट्टे करम
बेरा न कित सो रे सै

सदियाँ गुजरगी कदे या न सुणी
अक परमोसन होग्या
इसी नौकरी लाग्गी
मेरा तो शोषण होग्या

चलो छोडो यमराज जी,
सुरग कि राजनीती का के दौर सै
इंद्र ए जित्तैगा अक थारा जोर सै?

वो बोल्या- मैं के जित्तुं गा
मन्ने तो फारम ए न भरया
धोल़े लात्त्याँ का भाव देख कै
जी ए न करया

अर रही बात जित्तण की
तो वो ए जित्त्य पावैगा
जो सरे देव्त्यां कै घरां
दारू पहुंचावैगा

फेर चाल्लैगा बैंच तलै का लेणा अर देणा
दूसरे के दुखाँ म्हें झुट्ठी आँख भेणा

फेर बिछेगी वोट तोड़ण की
शतरंज कि बिसात
जिस म्हें प्यादे बनेंगे
धरम, भाषा, जात अर पात

फेर बदले जंगे ढोल
जिद बेर लाग्गैगा
किस कान्ही सै झोल

मैं बोल्या- छोडो यमराज जी न्यू क्युक्कर तिरो सो
वो चित्रगुप्त कित सै किम्मे ऐकले ए फिरो सो

वो बोल्या रै न पुच्छे या हे बात
वो तो मेरी यम्मी नै ल़े उड्या पाछली रात

इतनै म्हें उसकी आंख म्हें आंसू की धार आगी
अर मेरै उसकी दुखती रग थ्यागी

मैं बोल्या यमराज जी बीरबानियां का के ठिकाणा सै
आजकाल इस्सा ए जमाना सै

इब मेरली नै देख ल्यो वा के सुद्धी सै
शिकल की सिद्धी फेर अक्ल की मुद्धी सै

इब थारे तै के ल्ह्को सै वा रोज बेल्लण ठावे सै
दिन म्हें गधे की तरियां कमाऊं रात नै मुर्गा बनावै सै

न्यू सोच ल्यो अपन तो भाई-भाई सां
एक ए सुस्सरै के दो जमाई सां

इतनी देर म्हें वो मेरी बत्तां नै भांप ग्या
अर उसका मोट्टा हाथ मेरी घेट्टी नाप ग्या

मने अरदास करी-
मन्ने मर कै के पाओगे
मेरी दो हाड्डी सें
इनका के वज्रधनुष  बनाओगे

फेर मेरी आंखां आगै को
घूम ग्या दधीची
वो वृतासुर का आतंक
वा पाप की बगिच्ची

अर गेलयाँ घूम ग्या भारत म्हें फैल्या भ्रष्टाचार
महंगाई, बेरोजगारी, राजनीती की मार

आज गळी-गळी म्हें दानवता का नंगा नाच सै
खुद भाई के हात्था तै भाणा नै आंच सै

यो बेरोजगारी का दानव के छोट्टा सै
या राजनीती तो बे-पैंदी का लोट्टा सै

भ्रष्टाचार मिटाऊंगा न्यू कह के जो भी आवै सै
फेर इस्से दलदल म्हें धंस ज्यावे सै

इस नशाखोरी की भी गहरी जड़ गड री  सै
घरां बाळक तरसैं दूध नै महफ़िल म्हें दारु उड़ री सै

दहेज़ सै, भ्रूण-हत्या सै; जात-पात सै, धर्म सै
माँ-बाप की लिहाज नहीं के या ए शर्म सै?

आज भी अशिक्षा सै, शोषण सै, बाल-मजदूरी सै
घर-घर म्हें सें वृतासुर धधिची एक जरूरी सै

एक-एक बात मेरी आंखां म्हें तुल गी
फेर के करता इतनै म्हें मेरी आँख खुल गी

जिद बेर लाग्या अक या तो सुपने की बात थी
यमराज कित्ते न था, मैं था, काळी रात थी

मेरे क्यूँ न काढ़े प्राण इसे बात पै रोऊँ सूं
धक्के तै आँख मीच यमराज नै टोहूँ सूं

अक हे यमराज जी मेरा सुपा साच्ची कर दे
मेरी हाड्डी बेसक लेले, देश नै खुशियाँ तै भर दे

मैं तो ठंडी सांस भरूँ सूं
यमराज तै यो ए निवेदन करूँ सूं-

मेरी एक-एक हाड्डी ले ले
इनका वज्र-धनुष बणा दे
अर इस भ्रष्टाचार कै
वृत्तासुर नै मिटा दे!
अर इस भ्रष्टाचार कै
वृत्तासुर नै मिटा दे!
अर इस भ्रष्टाचार कै
वृत्तासुर नै मिटा दे!!

(हरियाणवी कविता-संग्रह "मोर के चंदे से")
बुधवार, 2 नवंबर 2011

जो तू कह / Jo Too Kah

जो तू कह वा बात कहूँगा
तू कह दिन नै रात कहूँगा

A B C नै क ख कह दयूं
दो अर दो नै सात कहूँगा

तेरै बाप नै कितणा पिट्या
क्युक्कर घुस्से-लात कहूँगा

बीर तेरा सीखै कर्राटे
चढ़गी मेरी स्यात कहूँगा

गऊ धंसी गारया म्हें मेरी
साम्मण की बरसात कहूँगा

आ तन्नै कोळी म्हें भर के
दिल के सब ज़ज्बात कहूँगा

(हरियाणवी कविता संग्रह "मोर के चंदे" से...)

म्हारै हरियाणा म्हें / Mharai Haryanai Mhain

होळी अर फाग गावैं, कूवै पै तै पाणी ल्यावैं,
इसी सोणी नार देखो म्हारै हरियाणा म्हें!
दामण-कुडती देखो, बोरला-चुंदड़ी देखो,
कंठी अर हार देखो म्हारै हरियाणा म्हें!
एक रहवैं भाई-भाई, मिलकै करैं कमाई,
प्रेम अर प्यार देखो, म्हारै हरियाणा म्हें!
तन के गठीले देखो, मन के रंगीले देखो,
आ कै एक बार देखो म्हारै हरियाणा म्हें!!
(हरियाणवी कविता-संग्रह "मोर के चंदे" से उद्धृत)