जो तू कह व बात कहूँगा!
तू कह दिन नै रात कहूँगा!!
A B C नै क ख कह द्यूं,
दो अर दो नै सात कहूँगा!
बीर तेरा सिक्खे कर्राटे,
चढ़गी मेरी स्यात कहूँगा!
गऊ धंसी गार्या म्हैं मेरी,
साम्मण की बरसात कहूँगा!
‘नमन’तन्नै कोळी म्हैं भरके,
दिल के सब ज़ज्बात कहूँगा!
.....
.....
या तो मैं पागल हूँ या शख्स यहाँ भरमाया है!
दुनिया कहती प्यार हुआ है, मैं कहता सब माया है!!
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या तो मैं पागल हूँ या शख्स यहाँ भरमाया है!
दुनिया कहती प्यार हुआ है, मैं कहता सब माया है!!
सुबह की जो लालिमा है बस सूरज के नाम न कर,
जुगनू बन कर मैंने खुद को सारी रात जलाया है!
यूँ ही नहीं कोई आया है साकी तेरी चौखट पे,
होशमंद दुनिया में जाकर सबने धोखा खाया है!
एक परिंदा मेरे दिल का भरता था परवाज़ कई,
देख हवा में फैले विष को अपना पर कटवाया है!
आज़ फैसला होगा मेरे हुनर-ए-संग-तराशी का,
'नमन' मेरी महफ़िल के भीतर वो पत्थर-दिल आया है!!
.....
-प्रवेश गौरी 'नमन'
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जमीदार की छोरी तन्नै प्रीत निभाई आण्डी।
तेरै प्यार म्हैं तूड़ी ढोऊँ लड़ै नगोड्डी काण्डी।।
ना कोए चारा,
लक्कड़ हारा,
बण्या बिच्यारा।
काण्डे गात छोलगे मेरा काट्टूँ किक्कर जाण्डी।
प्रीत नगोड्डी,
दुनिया छोड्डी,
टिकगी ठोड्डी।
तेरै बाप अर भाई नै मेरी जम कै देही चाण्डी।
झुट्ठी महबत,
फुट्टी किस्मत,
चढगी स्यामत।
तेरै बाप नै तेरी सगाई दूर गाम म्हैं माण्डी।
हो ना सूणा,
मारूँ कूणा,
कर द्यूँ टूणा।
‘नमन’ तेरी डोल़ी कै राह म्हैं टांगूँ काल़ी हाण्डी।।
-:-
जोड़े खड़्या सूँ हाथ शारदे चांदी करदे
छंद बणा दे दास तू कविता बांदी करदे
मन्नै मिट्ठी बाणी दे दे
लम्बी सी कोए क्हाणी दे दे
जिसकै उप्पर लिख-लिख कविता
महाकाव्य मैं छपवा द्यूँगा
टेड्ढी न्यूँ ना देक्खै षारदे
तेरा बी फोटू टिकवा द्यूँगा
मन्नै अपणा भगत जाण ले
बस इतणी सी बात मान ले
कवि सम्मेलन जिद करवाऊँ
मन्नै थोड़ा मिल ज्या पीसा
दो च्यार हार घल ज्याँ गल़ म्हैं
तो शक्कर म्हैं रळ ज्या घी सा
माँ घर म्हैं पीसा बरसा दे
धन का तू मी’-सा बरसा दे
करवाले चहे कोए समीक्षा
बेशक ले ले मेरी परीक्षा
चहे मेरे फट्टे चकवा दे
गळी बीच आधा गडवा दे
उप्पर तै ल्हासी खिण्डवा दे
बेशक कुत्त्याँ पै चटवा दे
पर नम्र निवेदन सै मेरा माँ
मेरे काच्चे से कटवा दे
माँ मन्नै मोबाइल द्युवा दे
इन होट्ठाँ पै स्माइल द्युवा दे
अंग्रेजी के बोल सिखा दे
उर्दू हाळे झोल सिखा दे
छंद घड़ूँ मैं गिटपिट-गिटपिट
शब्दाँ की मैं लाऊँ लिपिस्टिक
अपणी तबियत पै न्यूँ ऐठूँ
सभा बीच सज-धज कै बैठँू
फेर माँ! अपणै देस की फिकर कोन्या करूँ
भ्रष्टाचार का जिकर कोन्या करूँ
धोळे लत्याँ का डर सै
ना दोष धरूँ गुण्डागर्दी पै
मन्नै छिŸार खाणे सैं जो
कुछ बी लिखूँ खाक्खी वर्दी पै
एक जै कह द्यूँ हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई
कोण सुणैगा
इन सार्याँ नै आप्पस म्हैं जे कह द्यूँ भाई
कोण सुणैगा
लठ लाग्गैंगे, जूत पड़ैंगे
ब्होत ए घणी कसूत पड़ैंगे
खून की बह ज्यागी नदी-सी
मेरी छड़ देंगे गधी-सी
भारत पाक दुश्मनी चहे और घणी बढ ज्या
भारत माँ का हर बेट्टा उस बली वेदी पै चढ ज्या
मैं क्यूँ लिखूँ जिद दिल्ली ए ना शरमावै
उनकी सेक्की आप खावै
अर, ना लिखूँ मैं आज की नारी कै उप्पर
खुद नै सबला कहण आळी बिच्यारी कै उप्पर
यें सबला सैं तो यें भ्रुण हत्या क्युक्कर हो ज्यावैं सैं
क्यूँ बेट्टी की मासूम छवि बिन जाग्गे सो ज्यावैं सैं
नारी शोषण ना बंद होया
दहेज हत्या बेअंत बणी
मन्नै तो न्यूँ लाग्गै सै
यें युद्ध तै डरती संत बणी
कहण नै तो इननै सारे माँ कहवैं सैं
इनकै आँचल नै सिर की छाँ कहवैं सैं
फेर, क्यूँ इसपै दाग सै
नारी देवी सै,तो क्यूँ इसकै मूँह म्हैं झाग सै
फेर ना! इसपै तो मैं लिखूँ ए कोन्या
नारी चिंतक दिखूँ ए कोन्या
मैं क्यूँ मरवाऊँ झक
जिद कोए ना मांगै अपणा हक
चलो इन सबतै ध्यान तोड़ बी ल्यूँ
समाज कानी मूँह मोड़ बी ल्यूँ
किते भाषा का रण, किते जात की लड़ाई
किते काळै गौरै गात की लड़ाई
किते बढता भ्रष्टाचार, किते रिश्वतखोरी
लूट-पाट अराजकता, किते जारी चैरी
भारत माता बुढिया की तरियाँ
अपणे दिन काट्टै सै
क्युक्कर लिख द्यूँ मैं कविता
या कलम चलण तै नाट्टै सै
लिखणा मेरा सफल बणा दे
जनता कै मन अकल बणा दे
सारे एक हों, नारी मान हो
भारत पुष्पित कमल बणा दे।
भारत पुष्पित कमल बणा दे।।
जोड़े खड़्या सूँ हाथ शारदे चांदी करदे
छंद बणा दे दास तू कविता बांदी करदे
मन्नै मिट्ठी बाणी दे दे
लम्बी सी कोए क्हाणी दे दे
जिसकै उप्पर लिख-लिख कविता
महाकाव्य मैं छपवा द्यूँगा
टेड्ढी न्यूँ ना देक्खै षारदे
तेरा बी फोटू टिकवा द्यूँगा
मन्नै अपणा भगत जाण ले
बस इतणी सी बात मान ले
कवि सम्मेलन जिद करवाऊँ
मन्नै थोड़ा मिल ज्या पीसा
दो च्यार हार घल ज्याँ गल़ म्हैं
तो शक्कर म्हैं रळ ज्या घी सा
माँ घर म्हैं पीसा बरसा दे
धन का तू मी’-सा बरसा दे
करवाले चहे कोए समीक्षा
बेशक ले ले मेरी परीक्षा
चहे मेरे फट्टे चकवा दे
गळी बीच आधा गडवा दे
उप्पर तै ल्हासी खिण्डवा दे
बेशक कुत्त्याँ पै चटवा दे
पर नम्र निवेदन सै मेरा माँ
मेरे काच्चे से कटवा दे
माँ मन्नै मोबाइल द्युवा दे
इन होट्ठाँ पै स्माइल द्युवा दे
अंग्रेजी के बोल सिखा दे
उर्दू हाळे झोल सिखा दे
छंद घड़ूँ मैं गिटपिट-गिटपिट
शब्दाँ की मैं लाऊँ लिपिस्टिक
अपणी तबियत पै न्यूँ ऐठूँ
सभा बीच सज-धज कै बैठँू
फेर माँ! अपणै देस की फिकर कोन्या करूँ
भ्रष्टाचार का जिकर कोन्या करूँ
धोळे लत्याँ का डर सै
ना दोष धरूँ गुण्डागर्दी पै
मन्नै छिŸार खाणे सैं जो
कुछ बी लिखूँ खाक्खी वर्दी पै
एक जै कह द्यूँ हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई
कोण सुणैगा
इन सार्याँ नै आप्पस म्हैं जे कह द्यूँ भाई
कोण सुणैगा
लठ लाग्गैंगे, जूत पड़ैंगे
ब्होत ए घणी कसूत पड़ैंगे
खून की बह ज्यागी नदी-सी
मेरी छड़ देंगे गधी-सी
भारत पाक दुश्मनी चहे और घणी बढ ज्या
भारत माँ का हर बेट्टा उस बली वेदी पै चढ ज्या
मैं क्यूँ लिखूँ जिद दिल्ली ए ना शरमावै
उनकी सेक्की आप खावै
अर, ना लिखूँ मैं आज की नारी कै उप्पर
खुद नै सबला कहण आळी बिच्यारी कै उप्पर
यें सबला सैं तो यें भ्रुण हत्या क्युक्कर हो ज्यावैं सैं
क्यूँ बेट्टी की मासूम छवि बिन जाग्गे सो ज्यावैं सैं
नारी शोषण ना बंद होया
दहेज हत्या बेअंत बणी
मन्नै तो न्यूँ लाग्गै सै
यें युद्ध तै डरती संत बणी
कहण नै तो इननै सारे माँ कहवैं सैं
इनकै आँचल नै सिर की छाँ कहवैं सैं
फेर, क्यूँ इसपै दाग सै
नारी देवी सै,तो क्यूँ इसकै मूँह म्हैं झाग सै
फेर ना! इसपै तो मैं लिखूँ ए कोन्या
नारी चिंतक दिखूँ ए कोन्या
मैं क्यूँ मरवाऊँ झक
जिद कोए ना मांगै अपणा हक
चलो इन सबतै ध्यान तोड़ बी ल्यूँ
समाज कानी मूँह मोड़ बी ल्यूँ
किते भाषा का रण, किते जात की लड़ाई
किते काळै गौरै गात की लड़ाई
किते बढता भ्रष्टाचार, किते रिश्वतखोरी
लूट-पाट अराजकता, किते जारी चैरी
भारत माता बुढिया की तरियाँ
अपणे दिन काट्टै सै
क्युक्कर लिख द्यूँ मैं कविता
या कलम चलण तै नाट्टै सै
लिखणा मेरा सफल बणा दे
जनता कै मन अकल बणा दे
सारे एक हों, नारी मान हो
भारत पुष्पित कमल बणा दे।
भारत पुष्पित कमल बणा दे।।
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